Last updated: November 6th, 2026 at 04:37 am
Himachal High Court Stays Bank's Salary Recovery Action Against GuarantorShimla News: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने ऋण वसूली के एक मामले में बड़ी राहत देते हुए हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी बैंक को याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई करने से रोक दिया है। मामला दूसरे व्यक्ति के लिए गारंटर बने एक कर्मचारी के वेतन से हर महीने 40 हजार रुपये काटने से जुड़ा है।
न्यायमूर्ति संदीप शर्मा की अदालत ने पुनीत नेगी की याचिका पर सुनवाई करते हुए अपर रजिस्ट्रार (निगरानी), सहकारी समितियां, हिमाचल प्रदेश को निर्देश दिया कि 31 मार्च 2026 के आदेश के खिलाफ लंबित अपील पर प्राथमिकता के आधार पर दो महीने के भीतर फैसला लिया जाए।
दरअसल, पुनीत नेगी ने बैंक से ऋण लेने वाले एक अन्य व्यक्ति के लिए गारंटर की भूमिका निभाई थी। ऋण की अदायगी नहीं होने पर बैंक ने मूल कर्जदार के साथ गारंटर के खिलाफ भी वसूली की कार्रवाई शुरू कर दी। इसी कड़ी में 2 मई 2025 को बैंक के कलेक्टर (वसूली) ने नेगी का वेतन कुर्क करने का आदेश जारी किया था।
इस आदेश को चुनौती देते हुए नेगी ने हिमाचल प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम, 1968 की धारा 72 और 73 के तहत सक्षम प्राधिकारी के समक्ष याचिका दायर की, लेकिन 31 मार्च 2026 को उनकी याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद उन्होंने अपर रजिस्ट्रार (निगरानी) के समक्ष अपील दायर की, जो अभी लंबित है।
अपील पर सुनवाई पूरी होने से पहले ही 5 अगस्त 2026 को अंतरिम राहत हटाने का आदेश जारी कर दिया गया। इसके बाद 13 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर (वसूली) ने संशोधित आदेश जारी करते हुए नेगी के वेतन से हर महीने 40 हजार रुपये काटने के निर्देश दे दिए।
इसके खिलाफ पुनीत नेगी ने हाईकोर्ट का रुख किया और अपील का फैसला आने तक वसूली की कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग की। सुनवाई के दौरान बैंक के वकील ने भी सहमति जताई कि अपील के निस्तारण के लिए समय सीमा तय की जा सकती है और तब तक वेतन कुर्की पर रोक रखी जा सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब याचिकाकर्ता की अपील पहले से ही सक्षम प्राधिकारी के समक्ष लंबित थी, तो अधिकारियों को उसके निस्तारण तक संयम बरतना चाहिए था। अदालत ने निर्देश दिया कि अपील पर फैसला होने तक 5 अगस्त और 13 अक्टूबर 2026 के आदेशों के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश के जरिए मामले के मूल विवाद के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई है।
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